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बिहार दिवस पर समस्तीपुर में दौड़ी नई ऊर्जा, मिनी मैराथन में साहिल-अंजली बने विजेता; इतिहास और पहचान पर भी छिड़ी चर्चा

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मोहम्मद आलम प्रधान संपादक 

        (alamkikhabar.com)

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समस्तीपुर/पटना: बिहार दिवस 2026 के अवसर पर पूरे राज्य में जहां उत्सव और गौरव का माहौल देखने को मिला, वहीं समस्तीपुर में आयोजित मिनी मैराथन ने इस उत्साह को नई ऊर्जा दे दी। रविवार की सुबह जैसे ही घड़ी ने 6:30 बजाए, बियाडा प्रक्षेत्र स्थित जिला उद्योग केंद्र परिसर से सैकड़ों प्रतिभागी जोश और उमंग के साथ दौड़ पड़े। यह सिर्फ एक दौड़ नहीं थी, बल्कि ‘उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार’ के सपने को साकार करने की दिशा में जनभागीदारी और जागरूकता का जीवंत उदाहरण भी थी। जिला प्रशासन के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में पुरुष, महिलाएं, युवा, अधिकारी और कर्मचारी सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली, जिसने यह साबित कर दिया कि बिहार दिवस अब केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जन-उत्सव बन चुका है।

मैराथन को जिला पदाधिकारी रोशन कुशवाहा, पुलिस अधीक्षक अरविंद प्रताप सिंह और उप विकास आयुक्त सूर्य प्रताप सिंह ने संयुक्त रूप से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, पूरे मार्ग में उत्साह और ऊर्जा का माहौल बन गया। प्रतिभागियों का जोश देखते ही बन रहा था। दौड़ का रूट भी शहर के प्रमुख इलाकों से होकर गुजरा—जिला उद्योग केंद्र से शुरू होकर मोहनपुर पुल, नक्कु स्थान, बीआरबी कॉलेज, पटेल गोलंबर होते हुए यह मैराथन पटेल मैदान में जाकर समाप्त हुई। रास्ते में लोगों ने प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया, जिससे माहौल और भी प्रेरणादायक बन गया।

इस प्रतियोगिता में पुरुष वर्ग में बीप नंबर 5179 के साहिल कुमार ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पहला स्थान हासिल किया। उनके पीछे बीप नंबर 5116 के मो. अयानुल हक दूसरे और बीप नंबर 5007 के शिवम कुमार तीसरे स्थान पर रहे। महिला वर्ग में अंजली कुमारी ने बाजी मारते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया, जबकि खुशी रानी ने दूसरा और निक्की कुमारी ने तीसरा स्थान हासिल किया। वहीं, पदाधिकारी वर्ग में नगर आयुक्त ज्ञान प्रकाश पहले स्थान पर रहे, जबकि डीएम रोशन कुशवाहा दूसरे और डीटीओ सौरभ कुमार तीसरे स्थान पर रहे। विजेताओं को क्रमशः 5 हजार, 3 हजार और 2 हजार रुपये की नकद राशि के साथ प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर जिला पदाधिकारी रोशन कुशवाहा ने कहा कि बिहार दिवस केवल जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपनी सामूहिक शक्ति को समझने का अवसर भी है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन युवाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब युवा आगे बढ़ते हैं तो समाज भी आगे बढ़ता है, और यही एक विकसित बिहार की पहचान है। उन्होंने प्रतिभागियों की सराहना करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी यह दिखाती है कि समस्तीपुर विकास और जागरूकता की राह पर मजबूती से आगे बढ़ रहा है।

इस आयोजन में एडीएम ब्रजेश कुमार, एडीएम आपदा राजेश कुमार सिंह, एनडीसी रजनीश कुमार राय, एसडीओ दिलीप कुमार, ट्रैफिक डीएसपी आशिष राज और जिला खेल पदाधिकारी विवेक कुमार शर्मा सहित कई अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। पूरे परिसर में उत्सव जैसा माहौल था, जहां हर चेहरे पर गर्व और खुशी साफ झलक रही थी।

इसी बीच बिहार दिवस के अवसर पर राज्य की ऐतिहासिक पहचान और उसके नामकरण को लेकर भी चर्चा तेज रही। इतिहासकारों के अनुसार, आज जिसे हम बिहार के नाम से जानते हैं, उसका अतीत बेहद गौरवशाली और बहुआयामी रहा है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र मगध, मिथिला और अंग जैसे शक्तिशाली जनपदों के रूप में जाना जाता था। मगध साम्राज्य तो भारत के 16 महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली माना जाता था, जहां बिम्बिसार, अजातशत्रु, चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक जैसे महान शासकों ने शासन किया।

बिहार नाम की उत्पत्ति भी काफी रोचक है। यह शब्द संस्कृत और पाली भाषा के ‘विहार’ से निकला है, जिसका अर्थ होता है बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थान। माना जाता है कि जब गौतम बुद्ध को बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति हुई, तब से यह क्षेत्र बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र बन गया। यहां बड़ी संख्या में मठ और विहार स्थापित हुए, जहां भिक्षु साधना और अध्ययन करते थे। समय के साथ ‘विहार’ शब्द आम बोलचाल में ‘बिहार’ बन गया और यही नाम स्थायी रूप से प्रचलित हो गया।

मध्यकाल में जब तुर्क और मुस्लिम शासकों का आगमन हुआ, तो उन्होंने भी इस क्षेत्र को ‘बिहार’ के नाम से संबोधित किया। बाद में मुगल और ब्रिटिश काल में यह नाम पूरी तरह स्थापित हो गया। 22 मार्च 1912 को जब अंग्रेजों ने बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग कर बिहार और उड़ीसा को नया प्रांत बनाया, तब ‘बिहार’ नाम को आधिकारिक मान्यता मिली। बाद में 1936 में उड़ीसा अलग हुआ और 2000 में झारखंड के अलग होने के बाद बिहार अपने वर्तमान स्वरूप में आया।

बिहार का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्म की भी भूमि रही है। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने इसे विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। यहां से न केवल शिक्षा का प्रसार हुआ, बल्कि पूरी दुनिया को शांति और ज्ञान का संदेश भी मिला। यही कारण है कि बिहार को भारतीय सभ्यता और संस्कृति की धुरी माना जाता है।

आज के दौर में बिहार अपने अतीत की गौरवशाली विरासत को संजोते हुए विकास की नई राह पर आगे बढ़ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना और सामाजिक विकास के क्षेत्र में लगातार सुधार हो रहे हैं। बिहार दिवस जैसे आयोजन न केवल इस प्रगति को प्रदर्शित करते हैं, बल्कि लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी काम करते हैं।

समस्तीपुर की मिनी मैराथन हो या पटना में आयोजित भव्य समारोह, हर जगह एक ही संदेश गूंज रहा है—बिहार बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव केवल सरकार की नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी और जागरूकता का भी नतीजा है। बिहार दिवस का यह उत्सव इस बात का प्रतीक है कि राज्य अपने इतिहास पर गर्व करते हुए भविष्य की ओर आत्मविश्वास के साथ बढ़ रहा है।

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